Sunday, September 27, 2009

टॉप 10 सेक्टर

देश की अर्थव्यवस्था में आ रहे उफान की वजह से वर्ष 2008 में भी बूम वाले क्षेत्रों में नौकरियों की भरमार रहेगी। ऐसे में युवा इनसे संबंधित कोर्स करने को ही प्राथमिकता देंगे। खास बात यह है कि सरकार भी इस दिशा में प्रयासरत है और यही कारण है कि 11वीं पंचवर्षीय योजना के तहत इस साल से पूरे देश में स्किल डेवलपमेंट सेंटर्स खोलने पर अमल आरंभ हो जाएगा। इसके तहत युवाओं को मार्केट की डिमांड के मुताबिक ट्रेनिंग दी जाएगी। उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ वर्षो में कई क्षेत्र बडी तेजी से आगे बढे हैं, पर विडंबना यह है कि उनमें काम करने वाले योग्य लोग बमुश्किल मिल पा रहे हैं। ऐसे में स्किल्ड लोगों की कमी दूर करने के लिए निजी क्षेत्र के साथ-साथ सरकार को भी पहल करनी पडी है। हाल ही में एआईसीटीई के तत्वावधान में आयोजित एक उच्चस्तरीय सेमिनार में यह माना गया कि भारत का टेक्निकल एजुकेशन सिस्टम काफी पीछे चल रहा है। इस मौके पर एआईटीसीई के कार्यवाहक चेयरमैन प्रो. आरए यादव ने कहा कि टेक्निकल एजुकेशन के विकास को नया आयाम देने की शुरुआत की गई है।
तेजी से आगे बढते सेक्टर्स
विशेषज्ञों का मानना है कि रिटेल, रिअलॅ इस्टेट, एनिमेशन एवं गेमिंग, इंश्योरेंस व बैंकिंग, टेलीकम्युनिकेशन, आईटी/आईटीईएस, एविएशन, हॉस्पिटैलिटी, मैनेजमेट और इंजीनियरिंग इस साल के टॉप 10 सेक्टर होंगे, जिनमें शिक्षा व प्रशिक्षण प्राप्त युवाओं के लिए रोजगार पाना काफी आसान होगा। इसके अलावा कुछ और सेक्टर भी ऐसे होंगे, जिनमें इस वर्ष बूम आने की उम्मीद है। इनमें प्रमुख हैं : ऑटोमोबाइल, एंटरटेनमेंट, हेल्थकेयर-फार्मा, टूर ऐंड टै्रवेल, इवेंट मैनेजमेंट, मीडिया आदि। आइए देखते हैं कि इस वर्ष उक्त टॉप 10 सेक्टर्स की क्या स्थिति रहेगी :
रिटेल
इस समय देश के रिटेल सेक्टर का आकार करीब दो खरब डॉलर के बराबर है। हालांकि, इसमें संगठित क्षेत्र का योगदान मात्र साढे छह अरब डॉलर के बराबर ही है। अनुमान है कि वर्ष 2010 तक संगठित क्षेत्र का रिटेल बाजार तेजी से बढते हुए 23 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा। रिटेल देश का सबसे बडा निजी उद्योग है, जो देश के कुल जीडीपी में करीब 10 प्रतिशत का योगदान देता है। रिलायंस रिटेल के सीईओ रघु पिल्लई का कहना है कि रिटेल इंडस्ट्री में प्रशिक्षित लोगों की कमी को देखते हुए रिलायंस इंडस्ट्रीज रिटेल की पढाई के लिए एक विशेष विश्वविद्यालय खोलने पर विचार कर रही है।
रिअॅल इस्टेट
बढते शहरीकरण और अर्थ-व्यवस्था की मजबूती के चलते रिअॅल इस्टेट क्षेत्र तेजी से आगे बढ रहा है। देश के प्रमुख उद्योग संगठन एसोचैम (एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री) का मानना है कि इस क्षेत्र में अगले दस साल के दौरान प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) 30 अरब डॉलर हो जाने की उम्मीद है। वर्ष 2008 में इस क्षेत्र के 30 प्रतिशत की दर से वृद्धि करने की संभावना है। एसोचैम के अध्यक्ष वेणुगोपाल धूत का कहना है कि वर्तमान में घरेलू रिअलॅ इस्टेट बाजार 14 अरब डॉलर का है। अगले दस साल में इसके 102 अरब डॉलर का हो जाने का अनुमान है। धूत ने यह भी कहा कि लोगों की खरीद क्षमता बढने और संगठित रिटेल की शुरुआत के कारण खपत का स्वरूप बदल गया है। इससे रिटेल परियोजनाएं छोटे शहरों और कस्बों में भी लगाई जा रही हैं। इन सब कारणों से निर्माण में आ रही तेजी के चलते इससे संबंधित हर क्षेत्र में बडी संख्या में काबिल लोगों की जरूरत महसूस की जा रही है। इनमें आर्किटेक्ट, सिविल इंजीनियर, प्रोजेक्ट मैनेजर, मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव्स आदि प्रमुख हैं।
इंश्योरेंस एवं बैंकिंग
एलआईसी के सीनियर डिवीजनल मैनेजर (दिल्ली डिवीजन-2) राकेश कुमार का कहना है कि इंश्योरेंस सेक्टर 25-30 प्रतिशत वार्षिक की गति से विकास कर रहा है। इस दर को देखते हुए भारत के घरेलू बीमा बाजार का आकार वर्ष 2010 तक 60.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो जाने की उम्मीद है। इसकी पुष्टि एसोचैम की रिपोर्ट से भी होती है। ऐसे में इंश्योरेंस और एक्चुरियल साइंस का कोर्स करने वाले युवाओं के सामने अवसरों की कोई कमी नहीं होगी। आईसीए के चेयरमैन एनके श्यामसुखा कहते हैं कि भारत में कॉर्पोरेट सेक्टर के तेजी से आगे बढने और सरकारी तथा निजी बैंकिंग द्वारा अपना प्रसार करने के कारण प्रशिक्षित अकाउंटेंट्स की मांग में इस वर्ष और तेजी आएगी।
टेलीकम्युनिकेशन
देश संचार क्रांति के दौर से गुजर रहा है। भारत के विशाल बाजार को देखते हुए तमाम देशी-विदेशी कंपनियों ने यहां अपने पांव पसारे हैं। टेलीकम्युनिकेशन रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया यानी ट्राई के आंकडों के अनुसार नवंबर 2007 तक देश में मोबाइल फोन धारकों की संख्या 22.55 करोड तक पहुंच गई। भारतीय बाजार में जिस तरह से मोबाइल कंपनियां सक्रिय हैं, उसके लिए उन्हें डिजाइनिंग, मैन्युफैक्चरिंग और मार्केटिंग सभी के लिए एक्सपर्ट कर्मचारियों की जरूरत होती है।
एनिमेशन एवं गेमिंग
एप्टेक लिमिटेड के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर आर कृष्णन नैस्कॉम के आंकडों के आधार पर बताते हैं कि एनिमेशन एवं गेमिंग के क्षेत्र में वर्ष 2008 में भी प्रोफेशनल युवाओं की भारी डिमांड रहने की उम्मीद है। नैस्कॉम ने वर्ष 2008 में गेमिंग इंडस्ट्री के 55.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर का हो जाने का अनुमान लगाया है। गेको एनिमेशन स्टुडियो के सीईओ परेश मेहता कहते हैं कि इस वर्ष एनिमेशन इंडस्ट्री में ही अकेले 3 लाख लोगों की जरूरत होगी। एक्सप‌र्ट्स की सबसे अधिक आवश्यकता भारतीय फिल्मों और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में होगी। इसका उदाहरण हनुमान रिट‌र्न्स के बाद आई तेजी है।
हॉस्पिटैलिटी
टूरिज्म के फलने-फूलने के कारण हॉस्पिटैलिटी भी इस साल सबसे अधिक रोजगार देने वाले सेक्टर्स में से एक होगा। इसमें सर्वाधिक रोजगार होटल्स-रेस्टोरेंट्स-रिजॉ‌र्ट्स, एयरपो‌र्ट्स तथा कॉर्पोरेट ऑफिसों में होंगे। एक अनुमान के अनुसार 2010 तक टूरिज्म दुनिया की सबसे बडी इंडस्ट्री होगी। हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री के विशेषज्ञों का मानना है कि अगले कुछ वर्षो में अकेले भारत में होटल इंडस्ट्री में करीब 1,80,000 रिक्तियां होंगी।
आईटी/आईटीईएस
नैस्कॉम के ताजा आंकडों के अनुसार वर्ष 2006 में डोमेस्टिक बीपीओं मार्केट जहां 6 हजार करोड रुपये का था,जिसके वर्ष 2011 तक बढकर 30 हजार करोड रुपये तक पहुंच जाने की उम्मीद है। टीमलीज की ताजा रिपोर्ट के अनुसार आईटी इंडस्ट्री में इस साल 2.2 मिलियन जॉब अवसर सामने आएंगे। जबकि बीपीओ इंडस्ट्री में वर्ष 2010 तक 2.3 मिलियन लोगों को प्रत्यक्ष और 6.5 मिलियन अप्रत्यक्ष रोजगार मिल सकता है। ं दिल्ली स्थित ए-सेट के डायरेक्टर उदय कुमार वैश्य कहते हैं कि प्रतिष्ठित आईटी कंपनियों में नौकरी पाने के लिए जरूरी है कि संबंधित कोर्स उन प्रामाणिक संस्थानों से ही करें, जहां प्रैक्टिकल ट्रेनिंग अधिक से अधिक दी जाती हो और जहां सैन जैसे लेटेस्ट उपकरणों का प्रयोग करना सिखाया जाता हो।
एविएशन
भारत के एविएशन सेक्टर में देशी-विदेशी निजी व बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लगातार बढती संख्या के कारण इस फील्ड में एयरक्राफ्ट मेंटिनेंस इंजीनियर, पॉयलट, केबिन-क्रू मेंबर्स (एयर होस्टेस व फ्लाइट स्टीवर्ट), ग्राउंड व टिकटिंग स्टाफ की मांग इस वर्ष और बढेगी। 2008 में इस सेक्टर के 24 प्रतिशत की दर से विकास करने की उम्मीद है।
इंजीनियरिंग
इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में निर्माण बढने के कारण वर्ष 2008 में इंजीनियर्स की डिमांड में और इजाफा होने का अनुमान है। टीमलीज रिपोर्ट में कहा गया है कि सिविल इंजीनियरिंग के क्षेत्र में भारत को हर साल करीब 50,000 इंजीनियर्स की जरूरत होती है। इस बारे में नारायणा एकेडमी के डॉ. गोपाल का कहना है कि इन परीक्षाओं में बैठने वाले युवाओं को अपनी दसवीं-बारहवीं कोर्स के फंडामेंटल्स को पूरी तरह क्लियर कर लेना चाहिए।
मैनेजमेंट
भारत में कॉर्पोरेट सेक्टर के लगातार मजबूत होने और आगे बढने के चलते मैनेजमेंट प्रोफेशनल्स की मांग में भी खूब तेजी आई है। इसके लिए यदि आईआईएम या किसी अन्य टॉप मैनेजमेंट कॉलेज में एडमिशन मिल जाए, तो कहना ही क्या!
अन्य डिमांडिंग सेक्टर
उपर्युक्त क्षेत्रों के अलावा कई अन्य क्षेत्र भी हैं, जिनमें कोर्स करना जॉब की गारंटी साबित हो सकता है। इसमें ऑटोमोबाइल्स, एंटरटेनमेंट, इवेंट मैनेजमेंट, हेल्थ केयर-फार्मा, फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री आदि प्रमुख हैं। टीमलीज रिपोर्ट के अनुसार इंडियन इंडस्ट्री को इस समय उत्पादन कर्मचारी, भवन निर्माण कर्मचारी, परिवहन उपकरण संचालक, प्रशिक्षित श्रमिक, जैसे-इलेक्ट्रिक फिटर, असेंबलर, माइनर, पैकेजर, फूड प्रोसेसिंग वर्कर जैसे लोगों की जरूरत है। सर्विस सेक्टर को होटल कीपर, हाउस कीपर, मैट्रन, वेटर, कॉल सेंटर ऑपरेटर, कस्टमर रिलेशन, बिलिंग जैसे कामों के लिए बडी तादाद में कुशल लोग चाहिए। इन सेक्टर्स में प्रशिक्षित लोग सैलॅरी के अलावा फ्री-लांस बेसिस पर भी खूब कमा सकते हैं। इसलिए युवाओं को अपनी रुचि, योग्यता और क्षमता के अनुसार संबंधित कोर्स करके बेहतर करियर की राह पर कदम आगे बढाना चाहिए।

शिक्षा सात समंदर पार..

अपनी स्टूडेंट लाइफ में अमूमन हर व्यक्ति विदेश में पढने का सपना जरूर देखता है। मगर इनमें से कुछ ही लोगों का सपना हकीकत में तब्दील हो पाता है, क्योंकि अधिकांश छात्रों के सपने सिर्फ सपने बनकर ही रह जाते हैं। जो छात्र किन्हीं कारणों से विदेश नहीं जा पाते, वे इस धारणा से ग्रसित होते हैं कि विदेश में शिक्षा उनकी पहुंच के बाहर है। मगर आज हर किसी के लिए विदेश में शिक्षा प्राप्त करना आसान हो गया है। इसके लिए न केवल शिक्षण संस्थाओं, बल्कि बैंकों द्वारा भी खुलकर वित्तीय सहायता दी जाने लगी है। ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में दुनिया सिकुडती जा रही है, जिसके कारण दूरियों के अब कोई मायने नहीं रह गए हैं। दरअसल, इंटरनेट और टेलीफोन के जरिए अब आप विदेश में रहते हुए भी चौबीस घंटे अपने घर वालों से जुडे रह सकते हैं। कुछ वर्ष पहले तक यह धारणा थी कि विदेशों में मात्र अमीरों के बच्चे ही पढ सकते हैं, लेकिन आज फाइनैंशियल एड के जरिए सामान्य परिवारों के छात्र भी अपने इस सपने को पूरा कर सकते हैं। आम तौर पर छात्र विदेशों में पढने को एक बडी उपलब्धि मानते हैं। दरअसल, छात्रों में यह धारणा भी रहती है कि विदेश से पढकर आने के बाद जॉब मिलने में देर नहीं लगती, क्योंकि सीवी में ग्लोबल अनुभव आपकी अच्छी छवि को दर्शाता है।
मगर विदेश में पढाई करने से पहले कुछ बातों पर ध्यान देना बेहद जरूरी है, जैसे-किस तरह के कोर्स में एडमिशन लेना है, किस देश की किस यूनिवर्सिटी या कॉलेज में प्रवेश लेना है, इसके लिए पहले क्या-क्या करना होगा आदि। इसके संबंध में सभी कदम पहले ही उठाने होंगे, अन्यथा आपका पूरा करियर चौपट हो सकता है। इसलिए बेहतर होगा कि आप पूरी जानकारी हासिल करने के बाद ही विदेश में अपनी पढाई के सफर को आगे बढाएं। इसके लिए हर स्टेप पर सजग रहें। मुख्य रूप से किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए, बता रहे हैं टीएमजी ग्रुप के सीएमडी, विराज गुप्ता .
. यूनिवर्सिटी/कॉलेज का चयन
विदेशों से शिक्षा हासिल करने के लिए आवेदन करने से पहले आपको पूरी योजना तैयार करनी पडेगी। ऐसी योजना बनाते समय आपको कुछ बिंदुओं पर ध्यान जरूर देना पडेगा, जैसे-आपकी आर्थिक क्षमता और आवेदन करने में लगने वाला समय। दरअसल, विदेश में पढने से एक वर्ष पूर्व ही आवेदन कर दिया जाता है। साथ ही, आपको एक स्टैंडर्ड टेस्ट को भी पास करना होगा, जिसके लिए तैयारी करने की भी जरूरत पडेगी। विदेश में आवेदन करने से पहले इन निर्देशों का जरूर पालन करें :
सबसे पहले उन सभी यूनिवर्सिटीज की सूची बना लें, जिनमें आप पढना चाहते हैं। सूची बनाते समय इस बात पर भी ध्यान रखें कि जिस विषय में आपकी रुचि है, वह उस यूनिवर्सिटी में उपलब्ध है या नहीं!
इसके बाद उन यूनिवर्सिटीज का चयन कर लें, जो आपके बजट, स्थान, पाठ्यक्रम और इंफ्रास्ट्रक्चर के अनुकूल हैं। इससे आप बेवजह की परेशानी से तो बचेंगे ही, आवेदन में लगने वाला अतिरिक्त पैसा भी बचेगा।
प्रवेश से पहले जरूरी टेस्ट
अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों में पढने के लिए पूरी दुनिया से छात्र आवेदन करते हैं। ऐसे में इन सभी छात्रों की योग्यता जांचने-परखने के लिए कुछ मानक परीक्षाओं का आयोजन किया जाता है। सभी अंतरराष्ट्रीय छात्रों को फॉरेन यूनिवर्सिटीज में दाखिला पाने के लिए इन परीक्षाओं में शामिल होना अनिवार्य है। ये टेस्ट विभिन्न देशों के पाठ्यक्रमों के अनुकूल होते हैं। इनमें नीचे दी गई परीक्षाएं प्रमुख हैं :
SAT(उन छात्रों के लिए, जो अमेरिका में बैचलर डिग्री के लिए आवेदन कर रहे हैं)
GMAT(विदेश में रूक्चन् के लिए आवेदन करने वालों के लिए)
GRE (ग्रेजुएट रिकॉर्ड एग्जामिनेशन)
LSAT(लॉ स्कूल एडमिशन टेस्ट)
MCAT (मेडिकल कॉलेज एडमिशन टेस्ट)
TOEFL/IELTS(इंग्लिश प्रोफिसिएंसी टेस्ट)
जरूरी डाक्यूमेंट्स
विदेश में पढाई के इच्छुक छात्रों को आवेदन फॉर्म के साथ जरूरी डॉक्यूमेंट्स भी जमा करने पडते हैं, जैसे :
जिन विश्वविद्यालयों/कॉलेजों से शिक्षा हासिल किया है, उनकी सूची।
किसी संस्था से अनुशंसा का पत्र।
संबंधित विदेशी शिक्षण संस्थान में पढने का उद्देश्य
रिज्यूमे।
फाइनैंशियल कैपेबिलिटी सर्टिफिकेट/बैंक स्टेटमेंट।
फाइनल अप्लीकेशन फॉर्म (फीस सहित)।
फाइनैंशियल एड फॉर्म।
टेस्ट रिजल्ट्स (अगर चार से अधिक यूनिवर्सिटी में आवेदन किया गया हो)।
कैसे प्राप्त करें पासपोर्ट?
विदेश जाने के लिए (भले ही वह शिक्षा हासिल करने के लिए ही क्यों न हो) सबसे पहले अपने देश में पासपोर्ट बनवाना होता है। यदि आप पहली बार पासपोर्ट के लिए आवेदन कर रहे हैं, तो सबसे पहले आपको पासपोर्ट एक्सेप्टेंस फैसिलिटी में आवेदन करना पडेगा। यहां पर आपको गैर-हस्ताक्षरित अप्लीकेशन फॉर पासपोर्ट फॉर्म डी एस-ढ्ढढ्ढ की जरूरत पडेगी। साथ ही, इसके लिए अपनी नागरिकता का कोई प्रमाण भी देना होगा। पासपोर्ट के लिए आपको निकटतम क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय में आवेदन करना होगा।
पासपोर्ट की फीस
अलग-अलग अवधि और वैधता वाले पासपोर्ट की फीस इस प्रकार है:
दस साल की वैधता का नया पासपोर्ट : 1,000/- रुपये (पासपोर्ट बनने की अवधि-14 दिन)।
दस साल की वैधता का नया पासपोर्ट 1,500/- रुपये (एक सप्ताह के भीतर)।
पंद्रह साल से कम यानी अवयस्कों का नया पासपोर्ट : 600 रुपये।
पासपोर्ट के लिए आपको अपनी पहचान प्रमाणित करने के लिए निम्नलिखित में से किसी एक चीज की जरूरत होती है :
पिछला पासपोर्ट (यदि पहले से पासपोर्ट है और नया पासपोर्ट बनवाने के लिए)।
नागरिकता प्रमाण पत्र।
हाल में बना ड्राइविंग लाइसेंस।
कोई भी सरकारी पहचान-पत्र।
इसके अतिरिक्त छात्रों को दो पासपोर्ट साइज फोटोग्राफ की जरूरत होती है, जो यहां दी गई शर्तो के अनुसार होना चाहिए :
फोटो का साइज 2&2 इंच का होना चाहिए।
उससे आपकी पहचान साबित होनी चाहिए।
वह छह महीने से अधिक पुरानी नहीं होनी चाहिए और उससे आपका ताजा हुलिया मेल खाना चाहिए।
फोटो, कलर या ब्लैक एंड व्हाइट दोनों ही हो सकती है।
आपकी फोटो सामने से खिंची होनी चाहिए, जिस पर आपका पूरा चेहरा होना चाहिए।
कैसे प्राप्त करें वीसा?
पासपोर्ट प्राप्त करने के बाद, आप उस देश के नजदीकी काउंसलेट से संपर्क करें, जहां आप जाना चाहते हैं। वहां से आपको वीजा आवेदन से संबंधित सभी दस्तावेज मिल जाएंगे।
स्टूडेंट वीजा नीचे दी गई शर्तो पर ही दिया जाता है :
पहली शर्त के तहत इस बात का उल्लेख किया जाता है कि छात्र वहां फुल टाइम स्टडी करेगा, जिसमें वह सप्ताह के बीस घंटे कक्षा में बिताएगा।
दूसरी शर्त यह होती है कि छात्र कक्षा में कम से कम 80 प्रतिशत मौजूदगी दर्ज कराएगा।
अगली शर्त यह होती है कि छात्र इनरोल्ड विषय में संतोषजनक प्रदर्शन करेगा।
एक अन्य शर्त के तहत उसे हेल्थ कवरेज भी लेना पडेगा।
कई बार वीजा के लिए संबंधित देश के दूतावास द्वारा इंटरव्यू भी लिया जाता है, जिससे व्यक्ति की उपयुक्तता की जांच की जाती है। ऐसे अवसर पर वीजा ऑफिसर को हर सवाल का जवाब सही-सही देना चाहिए। दरअसल, वीजा ऑफिसर आपके शिक्षा के लिए विदेश जाने के उद्देश्य की जरूरत को समझना चाहता है। इस बात की पुष्टि जरूर कर लें कि आपके सभी दस्तावेजों की प्रतिलिपि वीजा अफसर के पास हो, जिसमें आपका फोटोग्राफ, पासपोर्ट, फाइनैंशियल डॉक्यूमेंट और आज तक की पढाई का ब्योरा हो।
बनाएं अपना बजट
कहीं भी जाने से पहले, उस देश की मुद्रा के आधार पर अपना बजट बनाएं। ऐसा भी देखने में आया है कि छात्र अपने पूरे सेमेस्टर का बजट महज एक सप्ताह में खत्म कर देते हैं। हालांकि, यह कोई चौंकाने वाली बात नहीं है। इसकी मुख्य वजह यह है कि हम वहां की मुद्रा का सही-सही आकलन नहीं कर पाते और गैर-जरूरी चीजों पर ठीक उसी तरह से खर्च करने लगते हैं, जैसे कि हम अपने देश में खर्च करते हैं। इसलिए यह बेहद आवश्यक है कि हम अपने बजट की योजना लिखित रूप में बनाएं, ताकि हमारे सामने सभी चीजें साफ-साफ दिखें। इसके लिए आप नीचे दिए गए बिंदुओं का सहारा ले सकते हैं :
सप्ताह और प्रतिदिन दोनों का बजट बनाएं और उस पर सख्ती से अमल करें।
मुद्रा के वर्तमान मूल्य को जानने की कोशिश करें (जैसे आपको यह पता होना चाहिए कि एक यूएस डॉलर कितने रुपये का होगा)।
जहां भी जाएं, वहां इस बात को लेकर हमेशा चौकन्ने रहें कि उस देश में छात्रों को छूट मिलती है कि नहीं! वास्तव में कई देशों में छात्रों को खाने-पीने में, सफर में और कई अन्य जगह स्पेशल डिस्काउंट मिलता। उस छूट को भुनाने में कभी न चूकें।
कोशिश करें कि अपना खाना खुद ही पका लें। इससे आपकी अच्छी-खासी बचत हो सकेगी।
दूसरे देश में अधिक खरीदारी से बचें।
जब कभी सफर करें, तो स्टूडेंट हॉस्टल में ही ठहरें। वहां पर आपको कम पैसों में अच्छी सुविधा मिल जाती है।
अपने सामान की सुरक्षा खुद करें, क्योंकि ऐसा कोई देश नहीं है, जहां चोरी-चकारी या लूट-पाट न होती हो।
विदेश में पढने के सपने की इस डगर पर आप खुशहाली से अपना सफर पूरा कर सकें, हमारी यही शुभकामना है।

आईटी की बहार हैं संभावनाएं अपार

नैकॉम-मैकिन्जे के एक ताजा अध्ययन के मुताबिक भारत का इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी सेक्टर इस समय प्रति वर्ष करीब 25 प्रतिशत की दर से आगे बढ रहा है। स्टडी के अनुसार आईटी सेक्टर के विकास की यह रफ्तार अगले पांच साल तक इसी तरह बनी रहेगी। इस विकास का प्रमुख कारण देश की आर्थिक तरक्की है, जिसकी वजह से विश्वव्यापी मंदी (खासकर अमेरिका में) के बावजूद भारत आईटी और बीपीओ (बिजनेस प्रॉसेस आउटसोर्सिग) के क्षेत्र में ग्लोबल लीडर बना हुआ है। हालांकि, रुपये के मुकाबले डॉलर के लगातार गिरते मूल्य के कारण इंडियन बीपीओ कंपनियों के मुनाफे में काफी गिरावट जरूर आई है, लेकिन इसके बावजूद उनके बिजनेस में लगातार इजाफा हो ही रहा है। इन सबके कारण आउटसोर्सिग से वर्ष 2010 तक देश को करीब 60 करोड डॉलर की आमदनी होने की उम्मीद है।
डिमांड ज्यादा, सप्लाई कम
आईटी सेक्टर में भारत के वर्चस्व को दुनिया में बनाए रखने के लिए सबसे बडा चैलेंज है-स्किल्ड मैनपॉवर की कमी को पूरा करना। देश के आईटी सेक्टर के सामने सबसे बडी समस्या पर्याप्त संख्या में एक्सपर्ट्स उपलब्ध न होना है। इस बारे में देश की सबसे बडी आईटी सर्विस प्रोवाइडर कंपनी टीसीएस (टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज) के सीईओ एस रामादुरई इस बात को स्वीकार करते हैं कि इस क्षेत्र में प्रशिक्षित लोगों की डिमांड बहुत ज्यादा है, जबकि सप्लाई बहुत कम। जानी-मानी सर्वे कंपनी मैकिन्जे के प्रमुख नौशिर काका आंकडों के आधार पर बताते हैं कि वर्तमान गति से चल रहे कारोबार को देखते हुए भारत को वर्ष 2010 तक 2.3 मिलियन (करीब 23 लाख) आईटी व बीपीओ एक्सपर्ट्स की जरूरत होगी, लेकिन देश में जिस रफ्तार से क्वॉलिफाइड लोग तैयार हो रहे हैं, उसमें 5 लाख की कमी बनी रहेगी। इस स्थिति को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि यदि युवा अपनी रुचि के अनुसार सॉफ्टवेयर या हार्डवेयर-नेटवर्किग से जुडा कोई भी कोर्स करते हैं, तो उनके लिए आकर्षक रोजगार का द्वार हमेशा खुला है और वह भी आकर्षक सैलॅरी पैकेज पर।
तरह-तरह के हैं काम
आईटी वर्ल्ड में तरह-तरह के काम हैं। खास बात यह है कि इन सभी कामों में खूब पैसा भी मिल रहा है। यही कारण है कि युवाओं के बीच इनसे संबंधित कोर्सो का जबर्दस्त क्रेज है और जिन संस्थानों में ऐसे कोर्स संचालित हैं, वहां स्टूडेंट्स की भीड लगी है। आइए जानते हैं किन-किन क्षेत्रों में स्किल्ड मैनपॉवर की जरूरत है :
सॉफ्टवेयर डेवलॅपमेंट : आईटी सेक्टर में सॉफ्टवेयर डेवलॅपमेंट के कार्य से सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स और प्रोग्रामर्स जुडे होते हैं। इनका मुख्य कार्य विभिन्न सॉफ्टवेयर लैंग्वेज में सॉफ्टवेयर डेवॅलप करना होता है। देखा जाए, तो सॉफ्टवेयर दो तरह के होते हैं-ऐप्लिकेशन सॉफ्टवेयर और सिस्टम सॉफ्टवेयर। इन सॉफ्टवेयर की सहायता से कई तरह के प्रोग्रामिंग लैंग्वेज तैयार किए जाते हैं, जिनका इस्तेमाल कंपनियां करती हैं। सॉफ्टवेयर डेवलॅपमेंट में काम करने के लिए नॉलेज को हमेशा अपडेट करते रहने के साथ ही प्रमुख प्रोग्रामिंग लैंग्वेजेज, जैसे- सी, सी++, जावा, विजुअल बेसिक आदि में विशेषज्ञता हासिल करनी होगी।
सिस्टम एनैलिस्ट : सिस्टम एनैलिस्ट कम्प्यूटर डेवलॅप करने का प्लॉन बनाते हैं। यदि सिस्टम एनैलिस्ट के रूप में करियर बनाना चाहते हैं, तो आपको सभी तरह के सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर की जानकारी रखनी होगी। सिस्टम एनैलिस्ट ग्राहकों की बिजनेस आवश्यकता को समझते हुए भी सिस्टम तैयार करने में दक्ष होते हैं।
डाटा बेस : डाटा बेस के तहत डाटा को इस प्रकार से स्टोर किया जाता है कि जरूरत पडने पर इन्हें आसानी से इस्तेमाल और अपटेड किया जा सके। किसी भी कंपनी के लिए उनका डाटा काफी मायने रखता है। ऐसे में डाटाबेस प्रोफेशनल्स की मांग तेजी से बढने लगी है, क्योंकि आज तकरीबन हर छोटी-बडी कंपनी डाटा मेंटेन करने और उन्हें अपटेड रखने की कोशिश करती रहती है।
सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर : सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर का मुख्य होता है। कार्य कनेक्टिविटी और इंटरनेट की सुविधा प्रदान करना। आईटी सेक्टर में नेटवर्किग काफी महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि नेटवर्किग के माध्यम से ही कम्प्यूटर एक दूसरे से जुडे होते हैं। देखा जाए, तो आज हर छोटे-बडे संस्थान में कम्प्यूटर नेटवर्किग के लिए सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर की जरूरत होती है। हालांकि, इस क्षेत्र में कार्य करने वालों को सिस्टम सिक्योरिटी के साथ-साथ नेटवर्किग सिक्योरिटी का भी ध्यान रखना पडता है। इसके अलावा, आप इस सेक्टर में कैड स्पेशलिस्ट, सिस्टम आर्किटेक्ट, विजुअल डिजाइनर, एचटीएमएल प्रोग्रामर, डोमेन स्पेशलिस्ट, इंफॉर्मेशन सिक्योरिटी एक्सपर्ट, इंटिग्रेशन स्पेशलिस्ट, कम्युनिकेशन इंजीनियर, सॉफ्टवेयर प्रोग्रामर, सेमीकंडक्टर स्पेशलिस्ट आदि के रूप में काम कर सकते हैं।
हार्डवेयर : सॉफ्टवेयर की तरह हार्डवेयर भी आईटी सेक्टर का महत्वपूर्ण अंग है। हार्डवेयर इंजीनियर के रूप में काम करने वालों पर कम्प्यूटर असेंबल करने से लेकर इसके खराब पा‌र्ट्स की मरम्मत तक की पूरी जिम्मेदारी होती है। दरअसल, आज हर जगह कम्प्यूटर के बढते इस्तेमाल के कारण ऐसे हार्डवेयर प्रोफेशनल्स की मांग काफी बढ गई है, जो कि कम्प्यूटर को चुस्त-दुरुस्त रखने में माहिर हों। हार्डवेयर के क्षेत्र से जुडने के बाद मैन्युफैक्चरिंग, रिसर्च ऐंड डेवलॅपमेंट आदि क्षेत्र में भी कार्य करने के भरपूर मौके मिलते हैं।
कोर्स हैं कई
कम्प्यूटर के क्षेत्र में दो तरह के काम होते हैं-पहला, सॉफ्टवेयर से संबंधित और दूसरा, हार्डवेयर से संबंधित। सॉफ्टवेयर के तहत जहां प्रोग्रामिंग और सॉफ्टवेयर डेवलॅपमेंट की ट्रेनिंग दी जाती है, वहीं हार्डवेयर के तहत कम्प्यूटर को असेंबल करने तथा किसी पार्ट के खराब होने पर उसे ठीक करने का प्रशिक्षण दिया जाता है। इनसे संबंधित कई तरह के कोर्स सरकारी और निजी संस्थाओं द्वारा चलाए जाते हैं। इनमें प्रमुख हैं :
ग्रेजुएट लेवॅल कोर्स : इसके लेवॅल पर प्रमुख कोर्स हैं-बीएससी नॉलेज को हमेशा अपडेट करते रहने के साथ ही प्रमुख प्रोग्रामिंग लैंग्वेजेज, जैसे- सी, सी++, जावा, विजुअल बेसिक आदि में विशेषज्ञता हासिल करनी होगी।
सिस्टम एनैलिस्ट : सिस्टम एनैलिस्ट कम्प्यूटर डेवलॅप करने का प्लॉन बनाते हैं। यदि सिस्टम एनैलिस्ट के रूप में करियर बनाना चाहते हैं, तो आपको सभी तरह के सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर की जानकारी रखनी होगी। सिस्टम एनैलिस्ट ग्राहकों की बिजनेस आवश्यकता को समझते हुए भी सिस्टम तैयार करने में दक्ष होते हैं।
सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर : आईटी सेक्टर में नेटवर्किग काफी महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि नेटवर्किग के माध्यम से ही कम्प्यूटर एक दूसरे से जुडे होते हैं। देखा जाए, तो आज हर छोटे-बडे संस्थान में कम्प्यूटर नेटवर्किग के लिए सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर की जरूरत होती है। हालांकि, इस क्षेत्र में कार्य करने वालों को सिस्टम सिक्योरिटी के साथ-साथ नेटवर्किग सिक्योरिटी का भी ध्यान रखना पडता है। इसके अलावा, आप इस सेक्टर में कैड स्पेशलिस्ट, सिस्टम आर्किटेक्ट, विजुअल डिजाइनर, एचटीएमएल प्रोग्रामर, डोमेन स्पेशलिस्ट, इंफॉर्मेशन सिक्योरिटी एक्सपर्ट, इंटिग्रेशन स्पेशलिस्ट, कम्युनिकेशन इंजीनियर, सॉफ्टवेयर प्रोग्रामर, सेमीकंडक्टर स्पेशलिस्ट आदि के रूप में काम कर सकते हैं।
हार्डवेयर : सॉफ्टवेयर की तरह हार्डवेयर भी आईटी सेक्टर का महत्वपूर्ण अंग है। हार्डवेयर इंजीनियर के रूप में काम करने वालों पर कम्प्यूटर असेंबल करने से लेकर इसके खराब पार्ट्स की मरम्मत तक की पूरी जिम्मेदारी होती है। आज हर जगह कम्प्यूटर के बढते इस्तेमाल के कारण ऐसे हार्डवेयर प्रोफेशनल्स की मांग काफी बढ गई है, जो कि कम्प्यूटर को चुस्त-दुरुस्त रखने में माहिर हों। हार्डवेयर के क्षेत्र से जुडने के बाद मैन्युफैक्चरिंग, रिसर्च ऐंड डेवलॅपमेंट आदि क्षेत्र में भी कार्य करने के भरपूर मौके मिलते हैं।
कोर्स हैं कई
कम्प्यूटर के क्षेत्र में दो तरह के काम होते हैं-पहला, सॉफ्टवेयर से संबंधित और दूसरा, हार्डवेयर से संबंधित। सॉफ्टवेयर के तहत जहां प्रोग्रामिंग और सॉफ्टवेयर डेवलॅपमेंट की ट्रेनिंग दी जाती है, वहीं हार्डवेयर के तहत कम्प्यूटर को असेंबल करने तथा किसी पार्ट के खराब होने पर उसे ठीक करने का प्रशिक्षण दिया जाता है। इनसे संबंधित कई तरह के कोर्स सरकारी और निजी संस्थाओं द्वारा चलाए जाते हैं। इनमें प्रमुख हैं :
ग्रेजुएट लेवॅल कोर्स : इसके लेवॅल पर प्रमुख कोर्स हैं-बीएससी इन कम्प्यूटर साइंस और बैचलर ऑफ कम्प्यूटर ऐप्लिकेशन यानी बीसीए। यह तीन साल का फुलटाइम कोर्स है। इसके अलावा आजकल सबसे ज्यादा क्रेज बीटेक (इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी या कम्यूटर साइंस) का है। यह कोर्स देश के सभी आईआईटी और इंजीनियरिंग कॉलेजों में है। आईआईटी में एडमिशन के लिए आईआईटी-जेईई उत्तीर्ण करनी होती है, जबकि अन्य इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश के लिए एआईईईई क्वालिफाई करना होता है। इन एंट्रेंस में शामिल होने के लिए फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथमेटिक्स के साथ बारहवीं उत्तीर्ण होना चाहिए। इसके तहत कम्प्यूटर के बेसिक्स के साथ विभिन्न सॉफ्टवेयर लैंग्वेजेज की जानकारी और सॉफ्टवेयर डेवलॅप करना सिखाया जाता है। पोस्ट-ग्रेजुएट कोर्स : मास्टर ऑफ कम्प्यूटर ऐप्लिकेशन यानी एमसीए तीन वर्ष का फुलटाइम पोस्ट-ग्रेजुएट कोर्स है। यह कोर्स करके स्टूडेंट्स सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम हो सकते हैं। इसके तहत कम्प्यूटर संबंधी अवधारणाओं और इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी की ठोस जानकारी दी जाती है। एमसीए प्रोग्राम में सी, सी++, जावा लैंग्वेज, टेक्निकल टॉपिक्स, जैसे-कम्प्यूटर डिजाइन, थ्योरी ऑफ कम्प्यूटिंग, डिस्क्रिट मैथमेटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ग्राफिक्स, एनिमेशन आदि भी पढाया जाता है। बीसीए या एमसीए वहीं से करना चाहिए, जहां इन कोर्सो को ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (एआईसीटीई) से मान्यता प्राप्त हो।
अन्य सॉफ्टवेयर कोर्स : उपर्युक्त कोर्सो के अलावा, मास्टर ऑफ कम्प्यूटर साइंस (एमसीएस), मास्टर ऑफ साइंस (कम्प्यूटर साइंस, इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग आदि) तथा कम्प्यूटर साइंस या इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी में एमफिल और पीएचडी भी किया जा सकता है।
हार्डवेयर-नेटवर्किग कोर्स : हर छोटे-बडे ऑफिस में कम्प्यूटर की अनिवार्यता को देखते हुए हार्डवेयर-नेटवर्किग एक्सपर्ट की डिमांड पूरी दुनिया में तेजी से बढ रही है। हार्डवेयर-नेटवर्किग कोर्स सामान्यतया निजी क्षेत्र के संस्थानों द्वारा चलाया जा रहा है। इस तरह के कोर्सो में कम्प्यूटर रिपेयर करने, असेंबल करने तथा खराब पुर्जो को बदलने की ट्रेनिंग दी जाती है। ऐसे कोर्स की अवधि सोलह से अठारह माह की होती है। इससे संबंधित कोर्स में प्रवेश लेने से पहले इस बात का खास खयाल रखें कि उस संस्थान में चिप लेवॅल की ट्रेनिंग दी जाती है या नहीं! यह एडवांस टेक्निक है। पहले कार्ड लेवॅल की ट्रेनिंग दी जाती थी, जो अब आउटडेटेड हो गई है। कार्ड लेवॅल में कम्प्यूटर के किसी पार्ट में खराबी आने पर पूरे खराब पार्ट को ही बदल दिया जाता था। पर अब चिप लेवॅल का प्रचलन है। इसमें कम्प्यूटर के जिस चिप में खराबी आती है, केवल उसकी मरम्मत करना सिखाया जाता है। इस बारे में दिल्ली स्थित ए-सेट के डायरेक्टर उदय कुमार वैश्य कहते हैं कि हार्डवेयर-नेटवर्किग के सीधे तौर पर जॉब ओरिएंटेड कोर्स होने के कारण स्टूडेंट्स को इससे संबंधित किसी भी संस्थान में प्रवेश के लिए खास सावधानी बरतनी चाहिए। प्रवेश वहीं लें, जहां चिप लेवॅल का एडवांस कोर्स कराया जाता हो और सैन जैसी उन्नत तकनीक का इस्तेमाल किया जाता हो। इसके अलावा पूरे कोर्स की एकमुश्त फीस न लेकर मासिक आधार पर ली जाती हो, ताकि पढाई से संतुष्ट न होने पर आप वह संस्थान छोडकर कहीं और एडमिशन ले सकें।
डोएक कोर्स : भारत सरकार के इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी मिनिस्ट्री के अंतर्गत कार्यरत स्वायत्त संस्था डोएक (डीओईएसीसी) द्वारा संचालित विभिन्न लेवॅल के कोर्स करके भी आईटी की दुनिया में स्थान बना सकते हैं। बीसीए या एमसीए जैसे कोर्सो में प्रवेश न पा सकने वाले स्टूडेंट इन कोर्सो में प्रवेश ले सकते हैं। देश भर में डोएक से संबद्ध करीब एक हजार से अधिक संस्थानों द्वारा कोर्स संचालित किए जाते हैं। ये कोर्स चार स्तरों पर संचालित होते हैं-ओ लेवॅल, ए लेवॅल, बी लेवॅल तथा सी लेवॅल। इनमें ओ लेवॅल को पॉलिटेक्निक या डिप्लोमा के समकक्ष माना जाता है। ए लेवॅल एडवांस डिप्लोमा या पीजी डिप्लोमा तथा बी लेवॅल को एमसीए या एमएससी के समकक्ष माना जाता है। सी लेवॅल सबसे उच्च श्रेणी का कोर्स है, जिसे एमटेक के बराबर मान्यता प्राप्त है। डोएक सोसायटी के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर पीएन गुप्ता का कहना है कि डोएक की डिग्रियों को भारत सरकार ने सभी तरह की नौकरियों के लिए मान्यता प्रदान की है।
वर्ष 2010 तक भारत में करीब 23 लाख आईटी एक्सपर्ट्स की जरूरत होगी।
वैश्रि्वक मंदी के बावजूद भारतीय आईटी इंडस्ट्री की सालाना ग्रोथ रेट 25 प्रतिशत है।
आईटी इंडस्ट्री को आउटसोर्सिग से वर्ष 2010 तक 60 करोड डॉलर की आमदनी होगी।
आईआईटी या इंजीनियरिंग कॉलेजों से बीटेक करके आईटी वर्ल्ड में पहचान बना सकते हैं।
हार्डवेयर-नेटवर्किग का कोर्स करके भी बडी व मल्टीनेशनल कंपनियों में जॉब पा सकते हैं।
प्रमुख संस्थान
देश के सभी आईआईटी (दिल्ली, कानपुर, खड्गपुर, रुडकी, गुवाहाटी, चेन्नई तथा मुंबई) वेबसाइट : www.iitd.ernet.in, www.iitk.ac.in, www.iitkgp.ac.in, www.iitr.ernet.in, www.iitg.ernet.in , www.iitm.ac.in , www.iitb.ac.in
सभी प्रमुख इंजीनियरिंग कॉलेज
डोएक सोसायटी वेबसाइट : www.doeacc.org.in
ए-सेट ट्रेनिंग ऐंड रिसर्च इंस्टीटयूट, 783/161, देशबंधु गुप्ता रोड, करोलबाग, नई दिल्ली, फोन (011)23553551-9, वेबसाइट : www.chiplevel.net
एप्टेक लिमिटेड वेबसाइट : www.aptec-worldwide.com
आईआईएचटी, वेबसाइट : www.iiht.com

कहां पढ़ें कहां न पढ़ें

परिमल कुमार ने इस वर्ष सीबीएसई बोर्ड से बारहवीं (पीसीबी) की परीक्षा दी है। उसके पिता उसका एडमिशन किसी प्रतिष्ठित डेंटल कॉलेज में कराना चाहते हैं। लेकिन तमाम कॉलेजों की भीड में उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा है कि उनके बेटे के लिए कौन-सा कॉलेज ठीक रहेगा। वहां चलाया जाने वाला कोर्स संबंधित आधिकारिक निकाय से मान्यता प्राप्त है या नहीं, वहां पढाई की गुणवत्ता कैसी है, कोर्स द्वारा ली जाने वाली फीस उनके बजट में है या नहीं! विकास सिंह ने छत्तीसगढ राज्य सरकार से मान्यता प्राप्त एक विश्वविद्यालय के दिल्ली स्थित कैम्पस में प्रवेश लिया था। इस संस्थान के इंफ्रास्ट्रक्चर से वे काफी प्रभावित थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए एक निर्णय में इस विश्वविद्यालय की डिग्री को अमान्य कर दिए जाने से वे चिंतित हो गए। कोर्ट का कहना था कि यूजीसी से मान्यता प्राप्त न होने के कारण इस विश्वविद्यालय द्वारा चलाए जा रहे कोर्सो को मान्यता नहीं दी जा सकती। ऐसे में विकास सिंह जैसे हजारों विद्यार्थियों का करियर दांव पर लग गया। ये दोनों ही स्थितियां इस बात की पुष्टि करती हैं कि किसी भी संस्थान में प्रवेश लेने से पहले उसकी और उसके द्वारा संचालित कोर्सो की परख आधिकारिक निकाय से जरूर कर लेनी चाहिए, अन्यथा युवाओं का करियर बनने की बजाय बिगड सकता है।
बाढ है संस्थानों की
भारत में शिक्षा हासिल करने वाले लोगों की बढती संख्या को देखते हुए बडे शहरों से लेकर छोटे शहरों तक में तमाम तरह के तकनीकी और गैर-तकनीकी संस्थानों की भी बाढ आ गई है। ऐसे में इसमें कौन-सा संस्थान असली है और कौन नकली, इसकी पहचान करना मुश्किल हो गया है। संस्थान अपने बारे में तमाम तरह के दावे करते हैं, लोगों को लुभाने के लिए बडे-बडे विज्ञापन देते हैं। छात्रों को उनकी असलियत का पता तब चलता है, जब वे वहां एडमिशन ले चुके होते हैं। ऐसे स्थिति में यदि वे अपना प्रवेश रद्द कराना चाहते हैं, तो ली गई फीस लौटाने में संस्थान द्वारा आना-कानी की जाती है। इस तरह के फर्जी संस्थान खासकर प्रोफेशनल कोर्स चलाने वाले क्षेत्रों (जैसे-इंजीनियरिंग, एमबीए आदि) में अधिक हैं। इसके अतिरिक्त आजकल ऐसे संस्थान भी खूब देखने को मिलते हैं, जो एक संकरी सी इमारत में चलते हैं और बीए से लेकर एमबीए तक तथा इंजीनियरिंग से लेकर मेडिसिन तक हर तरह का कोर्स कराने का दावा करते हैं। यह अपने आप में संदेह पैदा करता है कि कोई संस्थान अलग-अलग स्ट्रीम के ढेर सारे कोर्स कैसे संचालित कर सकता है?
असली और नकली
कौन-सा शिक्षण संस्थान असली है और कौन-सा नकली, इस बारे में पहले से सही-सही पता लगाना काफी मुश्किल होता है। लेकिन माता-पिता के गाढे पसीने की कमाई महंगी पढाई में लगाने से पहले ऐसे संस्थानों की जांच-परख करना आज काफी जरूरी हो गया है। इसके लिए सबसे पहले तो आप जिस संस्थान में प्रवेश लेना चाहते हैं, उसके बारे में जानकारी सीधे उसी से लेने का प्रयास करना चाहिए। यदि कोई सरकारी निकाय ऐसे संस्थानों की मान्यता के लिए उत्तरदायी है, तो उस सरकारी निकाय की वेबसाइट से इस संस्थान के बारे में जानकारी हासिल करें।
रखें ध्यान इन बातों का
यदि आप फर्जी संस्थानों के चंगुल से बचकर वाकई किसी प्रतिष्ठित संस्थान में दाखिला लेना चाहते हैं, तो सबसे पहले संस्थानों के चयन पर ध्यान दें। इसके लिए निम्नलिखित बातों का जरूर ध्यान रखें :
इंटरनेट के माध्यम से संस्थान से सीधे संपर्क करें और वांछित जानकारी लें।
संस्थान के कोर्सो को मान्यता देने वाले निकाय की वेबसाइट पर संस्थान की स्थिति जांचें।
अच्छे संस्थान संपर्क के लिए कई फोन लाइनें मुहैया कराते हैं, जबकि संदेहास्पद संस्थान प्राय: एक या दो लाइन का ही इस्तेमाल करते हैं। इसमें भी कई बार लैंड लाइन नंबर नहीं होता।
जाली संस्थानों की वेबसाइट पर अंतर्विरोधी बातें दिख जाती हैं। कभी वे कहती हैं कि उनके कोर्सो को विदेशी संस्थान से मान्यता हासिल है, तो कभी उनका कहना होता है कि उन्हें जल्दी ही मान्यता मिल जाएगी। सच तो यह है कि प्रतिष्ठित संस्थान अपनी मान्यता के बारे में स्पष्ट रूप से बताते हैं।
जाली संस्थान अक्सर प्रतिष्ठित विदेशी या देशी संस्थानों से मिलता-जुलता नाम रखकर लोगों को भ्रमित करने की कोशिश करते हैं। इस फेर में कतई न पडें।
इन निकायों से करें जांच
भारत में अलग-अलग क्षेत्रों से संबंधित शिक्षण संस्थानों को मान्यता देने तथा उन पर नियंत्रण रखने के लिए कई बॉडीज की स्थापना की गई है। कोई संस्थान असली है या नकली, इसकी जांच करने के लिए इन निकायों की वेबसाइट देखी जा सकती है या फिर इनसे सीधे संपर्क किया जा सकता है। ऐसी बॉडीज का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है :
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) : भारत सरकार द्वारा स्थापित यूजीसी देश के सभी विश्वविद्यालयों पर नजर रखने, उनका नियमन करने तथा नए विश्वविद्यालयों को मान्यता देने का काम करती है। छात्रों को जाली संस्थानों से बचाने के लिए यह समय-समय पर ऐसे संस्थानों की सूची भी जारी करती है। कोई विश्वविद्यालय फर्जी है या नहीं, इसकी जांच आयोग की वेबसाइट से की जा सकती है।
वेबसाइट : www.ugc.ac.in
ऑल इंडिया काउंसिल ऑफ टेक्निकल एजुकेशन (एआईसीटीई) : भारत में तकनीकी संस्थानों को खोलने, उनके द्वारा नए पाठयक्रम चलाने और उनका अनुमोदन करने का काम एआईसीटीई करती है। इसके सात रीजनल कार्यालयों (कानपुर, चंडीगढ, भोपाल, मुंबई, बंगलुरु, चंडीगढ तथा चेन्नई) से संपर्क कर तकनीकी संस्थाओं की जानकारी हासिल की जा सकती है। वेबसाइट : www.aicte.ernet.in
नेशनल काउंसिल फॉर टीचर्स एजुकेशन (एनसीटीई) : 1993 में स्थापित एनसीटीई का काम देश में टीचर्स एजुकेशन नेटवर्क को संचालित और नियोजित करना है। काउंसिल टीचर ट्रेनिंग का कोर्स चलाने वाले संस्थानों को मान्यता भी देती है। यहां से बीएड, एमएड, एमए-एजुकेशन आदि कोर्सो तथा इससे संबंधित संस्थानों की जानकारी ली जा सकती है। इसके रीजनल कार्यालय भोपाल, जयपुर, बंगलुरु तथा भुवनेश्वर में हैं। वेबसाइट : www.ncte.in.org
डिस्टेंस एजुकेशन काउंसिल (डीईसी) : इसकी स्थापना डिस्टेंस एजुकेशन और ओपन यूनिवर्सिटी सिस्टम को प्रोत्साहित करने के लिए की गई है। इस क्षेत्र के मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालयों की जानकारी डीईसी से ली जा सकती है। वेबसाइट : www.dec.ac.in
बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) : यहां से देश में लॉ से संबंधित सभी संस्थानों के बारे में जानकारी पाई जा सकती है। यह कानूनी शिक्षा के क्षेत्र के बारे में न केवल सुझाव देती है, बल्कि सुधार के कदम भी उठाती है। वेबसाइट : www.barcouncilofindia.nic.in
इंडियन काउंसिल फॉर एग्रीकल्चरल रिसर्च (आईसीएआर) : कृषि के क्षेत्र में रिसर्च एवं नई खोजों के लिए प्रतिबद्ध आईसीएआर कृषि विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों को अनुदान भी मुहैया कराता है। इससे कृषि से संबंधित कोर्स चलाने वाले संस्थानों की जानकारी ले सकते हैं। वेबसाइट : www.icar.org.in
मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई): यह चिकित्सा से संबंधित पाठयक्रमों को चलाने वाले संस्थानों का नियमन करती है। इसके माध्यम से मेडिकल क्षेत्र के संस्थानों के बारे में जाना जा सकता है। वेबसाइट : www.mciindia.org
सेंट्रल काउंसिल फॉर इंडियन मेडिसिन (सीसीआईएम): भारत की परंपरागत चिकित्सा शिक्षा पद्धतियों-आयुर्वेद, यूनानी, तिब्बती आदि से संबंधित कोर्सो और इन्हें संचालित करने वाले संस्थानों की वैधानिक संस्थानों की जानकारी इस काउंसिल से ली जा सकती है। वेबसाइट : www.ccimindia.org
सेंट्रल काउंसिल ऑफ होम्योपैथी (सीसीएच): सीसीएच होम्योपैथी से संबंधित कोर्स चलाने वाले विश्वविद्यालयों व संस्थानों को मान्यता प्रदान करता है। लेकिन इसके लिए उन संस्थानों को अपने कोर्स, इंफ्रास्ट्रक्चर और परीक्षा से जुडी हर तरह की जानकारी काउंसिल को उपलब्ध करानी होती है। वेबसाइट : www.cchindia.com
फॉर्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई): डीफार्मा, बीफार्मा जैसे कोर्स कराने वाले संस्थानों के बारे में जानकारी के लिए पीसीआई से संपर्क किया जा सकता है। वेबसाइट : www.pci.nic.in
डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया (डीसीआई): बीडीएस, एमडीएस जैसे डेंटल कोर्स चलाने वाले संस्थानों की जानकारी डीसीआई से मिल सकती है। वेबसाइट : www.dciindia.org
इंडियन नर्सिग काउंसिल (आईएनसी): नर्स, मिडवाइफ, हेल्थ विजिटर्स आदि से संबंधित पाठयक्रम (जैसे-नर्सिग में डिप्लोमा, डिग्री, पीएचडी आदि) चलाने वाले मान्यता प्राप्त संस्थानों के बारे में आईएनसी से पता किया जा सकता है। वेबसाइट : www.indiannurshingcouncil.org
काउंसिल ऑफ आर्किटेक्चर (सीओए): आर्किटेक्चर से संबंधित कोर्स चलाने वाले संस्थानों की वैधता से संबंधित जानकारी इस निकाय से हासिल की जा सकती है। वेबसाइट : www.coa.gov.in
हैं अपवाद भी
हालांकि कुछ संस्थान ऐसे भी होते हैं, जो काफी प्रतिष्ठित होते हैं, लेकिन इनके सभी कोर्सो को सरकारी निकाय से मान्यता नहीं मिली होती, या फिर एक निश्चित समय के लिए मिली होती है। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि इन संस्थानों का प्लेसमेंट रिकॉर्ड शानदार होता है। ऐसे संस्थान में एडमिशन लेने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए। इसके बावजूद अपने स्तर पर हर तरह से संस्थान और उसके कोर्सो की गुणवत्ता की जांच जरूर कर लें। डिग्री से ज्यादा स्किल है जरूरी कॉर्पोरेट कल्चर का तेजी से प्रसार होने और नए-नए क्षेत्र उभरकर सामने आने (खासकर निजी क्षेत्र में) से स्किल्ड लोगों की मांग काफी बढ गई है। इस बारे में टाइम के डायरेक्टर (दिल्ली) उल्हास वैरागकर का कहना है कि निजी क्षेत्र उन्हीं को प्राथमिकता देता है, जो क्वालिटी के साथ बढिया रिजल्ट दे सकें। उन्हें इससे कोई खास फर्क नहीं पडता कि उस व्यक्ति ने मान्यता प्राप्त संस्थान से पढाई की है या नहीं। वह जिस काम के लिए नियुक्ति कर रहा है, उसे उसमें दक्ष व्यक्ति चाहिए होता है। यही कारण है कि इन दिनों तमाम संस्थान (कई बडे संस्थान भी) सरकारी निकायों से एफिलिएशन या मान्यता हासिल करने (सरकारी संस्कृति और बाबूगिरी के कारण) को महत्व न देते हुए क्वालिटी एजुकेशन पर जोर देते हैं और स्टूडेंट्स को इंडस्ट्री की डिमांड के मुताबिक गढने की कोशिश करते हैं।
किस तरह का है संस्थान
इस बात को जानना भी जरूरी होता है कि आप जिस संस्थान में प्रवेश लेने जा रहे हैं, उसका स्तर कैसा है यानी वह डायरेक्ट यूनिवर्सिटी है, ऑफ शोर कैम्पस है या फिर मात्र स्टडी सेंटर। आपकी जानकारी के लिए आइए बताते हैं कि किस-किस तरह के संस्थान होते हैं :
केंद्रीय विश्वविद्यालय : केंद्रीय विश्वविद्यालय भारत सरकार के संसदीय अधिनियम के तहत गठित किए जाते हैं, जिनके चांसलर आमतौर पर राष्ट्रपति होते हैं। इन्हें केंद्र सरकार से सहायता मिलती है।
राज्य विश्वविद्यालय : राज्य विश्वविद्यालय संबंधित राज्य द्वारा स्थापित और संचालित किए जाते हैं। इन्हें यूजीसी से मान्यता और सहायता मिलती है। इसके चांसलर वहां के राज्यपाल होते हैं।
निजी विश्वविद्यालय : सोसायटी रजिस्ट्रेशन ऐक्ट, 1860, किसी राज्य के कानून या कंपनीज ऐक्ट, 1956 के सेक्शन-25 के तहत स्टेट या सेंट्रल ऐक्ट के तहत किसी प्रायोजक द्वारा स्थापित यूनिवर्सिटी। स्टेट ऐक्ट के तहत स्थापित प्राइवेट यूनिवर्सिटी उस राज्य की सीमा में ही संचालित की जा सकती है। पांच वर्ष पूरा करने के बाद ही ऐसी यूनिवर्सिटी निर्धारित शर्तो के तहत बाहर अपने कैम्पस बना सकती है।
स्टडी सेंटर : यूनिवर्सिटी द्वारा खासकर डिस्टेंस एजुकेशन के तहत छात्रों की सहायता के लिए गठित मान्यता प्राप्त केंद्र।
ऑफ शोर कैम्पस : प्राइवेट यूनिवर्सिटी द्वारा विदेश में स्थापित और संचालित कैम्पस।
ऑफ कैम्पस सेंटर : प्राइवेट यूनिवर्सिटी द्वारा मुख्य कैम्पस से बाहर उसी राज्य या किसी दूसरे राज्य में संचालित सेंटर।
ऐसे तलाशें संस्थान पता करें कि आप जो कोर्स करना चाहते हैं, उसके लोकप्रिय संस्थान कौन-कौन हैं।
चुने गए संस्थान की प्रामाणिकता और पढाई के स्तर के बारे में वहां से कोर्स कर चुके छात्रों से पता करने की कोशिश करें।
चमक-दमक से प्रभावित न होते हुए कोर्स की गुणवत्ता और संस्थान की प्रतिष्ठा को महत्व दें।
कम फीस या घर के करीब होने भर से ही प्रवेश न लें, बल्कि संस्थान की पॉपुलरिटी पर ध्यान दें।
यदि किसी अच्छे संस्थान में उस साल प्रवेश नहीं मिल पाता, तो हताश होने की बजाय एक-दो साल की तैयारी करके खुद को उसके लायक बनाएं।

क्रिएटिविटी को लगाएं पंख

हनुमान रिट‌र्न्स, रोडसाइड रोमियो, अर्जुन, अलीबाबा-चिंकू और द 40 थीव्स, बाल गणेश आदि में क्या समानता है? दरअसल, ये सभी पिछले एक साल में रिलीज और पॉपुलर होने वाली एनिमेशन फिल्में हैं। इन फिल्मों ने एनिमेशन को न केवल बेहद लोकप्रिय कर दिया है, बल्कि यह भ्रम भी दूर कर दिया है कि एनिमेशन केवल कार्टून फिल्म नहीं होता है।
इन एनिमेटेड फिल्मों में कॉजोल-अजय देवगन जैसे स्टार काम कर रहे हैं। आप टीवी पर कार्टून सीरियल्स काफी पहले से देखते आ रहे होंगे। बच्चे तो आज भी इनके दीवाने होते हैं। अधिकांश लोग टीवी के पर्दे पर चलने वाले इन कार्टून्स को ही एनिमेशन समझते रहे हैं। लेकिन ये कार्टून्स तो महज इसका एक पार्ट है। आज एनिमेशन का दायरा काफी व्यापक हो गया है। फिल्मों, विज्ञापनों में इसका खूब इस्तेमाल हो रहा है। एनिमेशन की मदद से फिल्मों और विज्ञापनों में टेक्नोलॉजी का कमाल दिखाया जा रहा है।
एनिमेशन में है बूम
फिक्की और प्राइस वाटर हाउस कूपर के ताजा अध्ययन के अनुसार, इंडियन एनिमेशन इंडस्ट्री वर्ष 2007 में 13 बिलियन डॉलर की थी, जिसके वर्ष 2012 तक 40 बिलियन डॉलर का हो जाने का अनुमान है। वर्तमान रफ्तार को देखते हुए उस समय तक इसके 25 प्रतिशत की दर से ग्रोथ करने की उम्मीद है। इसमें सबसे बडी भूमिका फिल्म व टेलीविजन सेगमेंट की होगी। खास बात यह है कि डोमेस्टिक डिमांड के साथ-साथ भारत से भारी संख्या में इंटरनेशनल एनिमेशन प्रोजेक्ट भी आउटसोर्स कराए जा रहे हैं। इसका कारण देश में इस क्षेत्र के कुशल एक्सप‌र्ट्स का होना है। लेकिन जितनी तेजी से यहां एनिमेशन वर्क आ रहा है, उस संख्या में कुशल एनिमेटर्स की भारी कमी महसूस की जा रही है।
करें प्रोफेशनल कोर्स
एनिमेशन ऐसा प्रोफेशनल कोर्स है, जिसे पूरा करने के बाद एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में काम ही काम है। इसमें चाहे तो आप किसी कंपनी में जॉब करें या फिर एसाइनमेंट बेसिस पर फ्रीलांस प्रोजेक्ट करें। दोनों में ही खूब पैसा है, बशर्ते आप जहां से कोर्स करें, वहां मार्केट की डिमांड के अनुसार लेटेस्ट इक्विपमेंट के माध्यम से ट्रेनिंग दी जाती हो। इसके साथ ही, आपमें भरपूर क्रिएटिविटी होनी चाहिए, तभी आप अपनी कल्पनाओं को पंख लगा सकते हैं। यदि आपने बीएफए यानी बैचलर ऑफ फाइन आ‌र्ट्स, एमएफए यानी मास्टर ऑफ फाइन आ‌र्ट्स किया है या कर रहे हैं, तो इस क्षेत्र में आप धूम मचा सकते हैं। ये कोर्स करके आप ड्राइंग-डिजाइन में पारंगत हो जाते हैं। इसके बाद आपको कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर की मदद से नए-नए सृजन करने होते हैं। वैसे तो एनआईडी, अहमदाबाद सहित अनेक उच्च संस्थानों में डिजाइन कोर्स उपलब्ध हैं। इसके अलावा कम्प्यूटर एनिमेशन कोर्स कई निजी संस्थानों में भी संचालित किए जाते हैं, जिनकी अवधि एक से दो वर्ष की होती है। ये डिप्लोमा या सर्टिफिकेट कोर्स के रूप में हो सकते हैं। इन कोर्सो में बारहवीं (किसी भी स्ट्रीम में) के बाद प्रवेश लिया जा सकता है। लेकिन किसी भी संस्थान में प्रवेश लेने से पहले बात की जांच जरूर कर लें कि आपमें कितनी क्रिएटिविटी है और आप इसे किस तरह डेवलॅप करते हैं। दिल्ली स्थित गेको एनिमेशन स्टुडियो के डायरेक्टर और सीईओ परेश मेहता कहते हैं कि कोर्स के दौरान स्टूडेंट्स को इंटर्नशिप भी कराई जाती है। इसके अंतर्गत हमारे अपने प्रोडक्शन हाउस के प्रोजेक्ट में काम करने का अवसर दिया जाता है, जहां उन्हें बेहद अनुभवी व एक्सप‌र्ट्स के साथ सीखने का मौका मिलता है। यदि इस क्षेत्र में आपकी रुचि है, तो फिर देर किस बात की, किसी विश्वसनीय संस्थान से कोर्स करने के लिए कदम बढाएं।
प्रमुख संस्थान
जेआईएमएमसी स्कूल ऑफ एनिमेशन एफ-33, सेक्टर-6, नोएडा-201 301 (उ.प्र.) फोन : 0120-2423950, 2423951, ई-मेल : jimmcnoida@gmail.com
वेबसाइट : www.jimmc.in
गेको एनिमेशन स्टुडियो, ई-10, सेकॅन्ड-थर्ड फ्लोर, साउथ एक्सटेंशन, पार्ट-2, मेन मार्केट, नई दिल्ली, फोन : 011-46035357/8, वेबसाइट : www.geckoindia.com
माया एकेडमी ऑफ एडवांस्ड सिनेमेटिक्स (मैक), मैग्टेक टॉवर, सी-56/36, सेक्टर-62, नोएडा, फोन : 0120-4249440, ई-मेल : noida@maacmail.com
एरीना एनिमेशन, ए-65, मारोल, अंधेरी (पूर्व), मुंबई

मीडिया में हैं संभावनाएं अपार

कैमरा पर्सन के साथ मैं एक्सवाईजेड टीवी के लिए। नमस्कार सबसे पहले नजर डालते हैं आज की सुर्खियों पर टीवी रिपोर्टर और न्यूज ऐंकर का यह अंदाज क्या आपको भी प्रभावित करता है? यदि आप मीडिया के इस अंदाज-ए-बयां को अपना अंदाज बनाना चाहते हैं, तो दिल्ली विश्वविद्यालय के महाराजा अग्रसेन कॉलेज से मीडिया सर्टिफिकेट कोर्स कर सकते हैं।
कोर्स की रूपरेखा
एचएमएस फिल्म्स ऐंड टीवी इंस्टीट्यूट के सहयोग से महाराजा अग्रसेन कॉलेज टीवी न्यूज रीडिंग, रिपोर्टिग, ऐंकरिंग ऐंड वॉयस ओवर और सिनेमेटोग्राफी-कैमरा ऐंड लाइटिंग टेक्निक्स में तीन-तीन माह के दो सर्टिफिकेट कोर्स संचालित कर रहा है। दोनों ही कोर्सो में स्टूडेंट्स को संबंधित क्षेत्रों के विशेषज्ञों द्वारा सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाएगा।
प्रवेश के लिए योग्यता
इस कोर्स में प्रवेश के लिए उम्मीदवार की न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता बारहवीं पास है। इस कोर्स में ऐसे उम्मीदवार भी एडमिशन ले सकते हैं, जो पहले से नौकरीपेशा हैं और मीडिया में रुचि होने की वजह से इस कोर्स को करना चाहते हैं।
सीटों की संख्या
दोनों ही पाठ्यक्रमों में 25-25 विद्यार्थियों को एडमिशन दिया जाएगा।
कोर्स की फीस
महाराजा अग्रसेन कॉलेज व डीयू के विद्यार्थियों के लिए दोनों कोर्सो की फीस अलग-अलग लगभग 12 हजार रुपये है, जबकि अन्य छात्रों के लिए दोनों कोर्सो की फीस 15-15 हजार रुपये निर्धारित की गई है।
आवेदन की अंतिम तिथि
इन कोर्सो में प्रवेश के लिए 12 नवंबर, 2008 तक आवेदन किया जा सकता है। इसके लिए फॉर्म कॉलेज से ही प्राप्त किए जा सकते हैं। भरे हुए फॉर्म कॉलेज में ही जमा किए जाएंगे। इन कोर्सो की कक्षाएं 15 नवंबर से कॉलेज कैंपस में सप्ताह में दो दिन दोपहर 2 बजे के बाद चलाई जाएंगी।
कहां करें आवेदन
महाराजा अग्रसेन कॉलेज, मयूर विहार फेज-वन, डीडीए फ्लैट्स परिसर, दिल्ली-110091
फोन : 011-22718067
वेबसाइट : www.macdu.com
व्यावहारिक प्रशिक्षण पर अधिक जोर
हमारे इस कोर्स के अंतर्गत विद्यार्थियों को हैंड्स ऑन प्रैक्टिकल ट्रेनिंग के जरिए मीडिया में कार्य करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। गेस्ट फैकल्टी के रूप में इस क्षेत्र के विशेषज्ञ सीधे विद्यार्थियों से रूबरू होते हैं। स्टूडेंट्स को व्यावहारिक प्रशिक्षण और प्लेसमेंट के लिए हमने एक मीडिया हाउस से टाई-अप किया है।
दरअसल, इस कोर्स का पूरा फोकस इस पर है कि हम मीडिया में कार्य करने के लिए बेहतर प्रोफेशनल्स तैयार कर सकें। कॉलेज में अपना स्टूडियो तो है ही, जिसमें छात्र तकनीकी बारीकियां सीखते हैं, इसके अलावा व्यावहारिक प्रशिक्षण के लिए स्टूडेंट्स को स्टूडियो विजिट भी करवाई जाती है।

मल्टीमीडिया के महारथी

न्यूयार्क की सडकों पर मुंह से आग उगलता गॉडजिला, पृथ्वी पर घूमते दूसरे ग्रह के अजीबोगरीब प्राणी एलियंस, ऊंची-ऊंची बिल्डिंगों पर रेंगता स्पाइडरमैन, राक्षसों से लडते हनुमान व गणेश और बच्चों को लुभाता जंबो! ये सभी पात्र और इनके कारनामे एनिमेशन और मल्टीमीडिया तकनीक की बदौलत ही स्क्रीन पर उभर सके। यही कारण है कि एनिमेशन और मल्टीमीडिया का प्रभाव सिर्फ सिनेमा में ही नहीं, बल्कि एडवरटाइजिंग, टीवी मीडिया, एजुकेशन, गेम आदि क्षेत्रों में भी असर डाल रहा है। गेको एनिमेशन के परेश मेहता कहते हैं कि आज भारत में ही नहीं, विदेश में भी इस क्षेत्र में अपार संभावनाएं दिख रही हैं।
मल्टीमीडिया और एनिमेशन
टेक्स्ट, एनिमेशन, ग्राफिक्स, साउंड, वीडियो आदि का मिलाजुला रूप है-मल्टीमीडिया। दूसरे शब्दों में, ऑडियो-वीडियो मैटेरियल को खूबसूरती से पेश करना ही मल्टीमीडिया का काम है। इससे जुडा है एनिमेशन, जिसमें डिजाइन, ड्राइंग, ले-आउट और फोटोग्राफी को खूबसूरती से एक सूत्र में पिरोया जाता है।
किस तरह के हैं कोर्स
बैचलर्स इन मल्टीमीडिया
बैचलर इन एनिमेशन
बैचलर इन डिजिटिल मीडिया
बैचलर इन गेम्स एंड इंट्रैक्टिव मीडिया डिजाइन
बैचलर इन ग्राफिक डिजाइन
बैचलर इन विजुअल कम्युनिकेशन
डिप्लोमा इन मल्टीमीडिया ऐंड एनिमेशन
क्या है योग्यता
मल्टीमीडिया और एनिमेशन में बैचलर डिग्री और डिप्लोमा स्तर के कई कोर्स हैं, जिनमें दाखिला के लिए किसी भी मान्यता प्राप्त बोर्ड से बारहवीं पास होना जरूरी है। इस कोर्स में पीजी प्रोग्राम में दाखिला के लिए किसी भी संकाय में बैचलर डिग्री आवश्यक है।
आवश्यक गुण
इस क्षेत्र में महारत हासिल करने के लिए भरपूर क्रिएटिवीटी और इमेजिनेशन क्षमता जरूरी है। इसके अतिरिक्त, कम्प्यूटर की जानकारी, अच्छी पर्सनैल्टि, फ्लेक्सिवीलिटी, मैथेमेटिकल ऐंड एनालिटिकल स्किल्स, कम्युनिकेशन स्किल, दूसरों के साथ काम करने की क्षमता, कलात्मक अभिरुचि भी जरूरी है।
संभावनाएं
भारतीय मीडिया और एंटरटेनमेंट बाजार पूरी दुनिया में अग्रणी है। दिल्ली स्थित प्रान्स मीडिया के निखिल प्राण का कहना है कि यहां प्रत्येक साल बनने वाली फिल्मों की संख्या अन्य देशों की अपेक्षा कहीं अधिक है, जो कि सालाना 20 फीसदी की दर से विकास कर रहा है। फिलहाल एनिमेटेड फिल्मों के अतिरिक्त वीडियो गेम का भी बाजार उछाल पर है। एनिमेशन विशेषज्ञ प्रदीप्तो भट्टाचार्य ने एक रिपोर्ट के हवाले से बताया, इन दिनों भारतीय एनिमेशन इंडस्ट्री ट्रेंड प्रोफेशनलों की कमी जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है। आगामी वर्षो में 2 लाख मल्टीमीडिया प्रोफेशनलों की जरूरत होगी। एक अनुमान के मुताबिक, ग्लोबल एनिमेशन इंडस्ट्री इस वर्ष 75 बिलियन अमेरिकी डॉलर का हो जाएगा, जिसमें भारतीय भागीदारी करीब 95 करोड अमेरिकी डॉलर होने की आशा है। वर्ष 2005-2009 में एनिमेशन इंडस्ट्री का विकास 37 फीसदी सालाना की दर से हो रहा है। मल्टीमीडिया व एनिमेशन के अन्य क्षेत्र जैसे कि वीडियो गेम्स का बाजार इस वर्ष 300 मिलियन डॉलर तक पहुंचने की संभावना है।
संस्थान
आईआईटी गुवाहाटी
www.iitg.ernet.in
आईआईटी मुंबई
www.iitb.ac.in
जागरण इंस्टीटयूट ऑफ मैनेजमेंट ऐंड मास कम्युनिकेशन, नोएडा
www.jimmc.in
एरिना एनिमेशन एकेडमी
www.arenamultimedia. com
इंटिग्रेटेड मैनेजमेंट कॉलेज, नई दिल्ली
www.imc.edu.in
माया एकेडमी ऑफ एडवांस सिनेमेटिक्स, हैदराबाद, मुंबई, नई दिल्ली
www.reachouthyd.com
प्रान्स मीडिया, नई दिल्ली
www.pran.in
गेको एनिमेशन स्टुडियो नई दिल्ली
www.geckoindia.in
एएफए एनिमेशन एंड फाईन आटर्स एकेडमी, कोयम्बटूर
www.afaanimationindia.com
सुमन कुमार झा
नहीं है मंदी का असर
मल्टीमीडिया और एनिमेशन के क्षेत्र में अभी भी मंदी का अधिक असर नहीं देखा जा रहा है। इस क्षेत्र में क्या हैं स्कोप, इस पर विजय झा ने बात की जेआईएमएमसी के डायरेक्टर जे.आर. शरण से। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश ..
अनेक विकल्प होने के बावजूद मल्टीमीडिया व एनिमेशन कोर्स को ही क्यों चुनें?
आजकल करियर के बहुत सारे विकल्प उपलब्ध रहने के बावजूद एनिमेशन और मल्टीमीडिया कोर्स काफी पॉपूलर है। इसका कारण यह है कि मंदी से जहां एक ओर हर सेक्टर किसी न किसी रूप से प्रभावित हो रहा है, वहीं दूसरी ओर यह सेक्टर बहुत अधिक प्रभावित नहीं हुआ है। एक अनुमान के मुताबिक, अभी भी भारतीय गेमिंग सेक्टर इस वर्ष लगभग 37 प्रतिशत की दर से ग्रो कर रहा है। इसके अतिरिक्त इसमें रोजगार के कई विकल्प भी मौजूद हैं।
आ‌र्ट्स स्टूडेंट्स के लिए इसमें किस तरह के अवसर हैं?
यह क्षेत्र सभी स्टूडेंट्स के लिए समान अवसर मुहैया कराता है। इसमें सफल होने के लिए जरूरी नहीं कि आपके पास मैथमेटिकल ज्ञान हो। यदि आप मेहनती और क्रिएटिव हैं और हमेशा कुछ नया करना चाहते हैं, तो यह क्षेत्र आपके लिए सबसे बेहतर है।
इस कोर्स को करने के बाद कहां-कहां रोजगार मिल सकते हैं?
एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री, वीडियो गेम कंपनी, एडवरटाइजिंग फर्म, कम्प्यूटर कंपनी आदि में रोजगार के कई विकल्प मौजूद हैं। ट्रेंड प्रोफेशनल अपने करियर की शुरुआत ऐड इंडस्ट्री से भी कर सकते हैं। इसके अलावा, टेक्सचर आर्टिस्ट, 3-डी मॉडलर्स, एनिमेटर्स आदि के रूप में अपना करियर संवार सकते हैं। इस क्षेत्र में स्वरोजगार की भी काफी संभावनाएं हैं।
संस्थान के चयन में किस तरह की सावधानी जरूरी है?
संस्थान का चयन करते समय सबसे पहले संस्थान का इंफ्रास्ट्रक्चर देखें। इसके अतिरिक्त संस्थान के प्लेसमेंट रिकॉर्ड और वहां के फैकल्टी मेंबर के बारे में जानकारी अवश्य प्राप्त करें। यदि कोई संस्थान अधिक फीस लेने के बावजूद बेहतर सुविधा दे रहा है, तो उसे ही वरीयता दें।
इस कोर्स को करने के बाद शुरुआती ट्रेंड प्रोफेशनलों को कितनी सैलॅरी मिल जाती है?
यह काफी हद तक संस्थान और स्टूडेंट पर निर्भर करता है। कहने का आशय यह है कि यदि आपने अच्छे इंस्टीट्यूट्स से पास किया है, तो आपको अच्छी सैलॅरी मिल सकती है। इस क्षेत्र के ट्रेंड प्रोफेशनलों को शुरुआती दिनो में दस से बारह हजार रुपये तो मिलते ही जाते हैं। अनुभव के बाद उनमें बढोत्तरी होती रहती है।
इस क्षेत्र में आनेवाले स्टूडेंट्स को क्या सलाह देंगे?
कोर्स चुनने से पहले आपको यह निर्णय लेना होगा कि आप ग्राफिक डिजाइनर, कला निर्देशक, एनिमेटर, मल्टीमीडिया डिजाइनर में से क्या बनना चाहते हैं! जिस क्षेत्र का चुनाव करें, उसमें अधिक से अधिक सीखने की कोशिश करें। कहने का आशय यह है कि कोर्स करने के दौरान अपनी रुचि के अनुरूप किसी एक क्षेत्र में विशेषज्ञ बनने की कोशिश करेंगे, तो हमेशा फायदे में रहेंगे।
जेआईएमएमसी के डायरेक्टर जे.आर.शरण से विजय झा की बातचीत पर आधारित
खूब संभावनाएं मल्टीमीडिया में
प्रतिभाओं के मामले में धनी होने के कारण भारत में मल्टीमीडिया और एनिमेशन के विकास की काफी संभावनाएं हैं। मल्टी मीडिया टूल्स का विस्तार बहुत बडे क्षेत्रों में है। इसमें एंटरटेनमेंट से लेकर एजुकेशनल टयूटर तक शामिल हैं। अपने मजबूत आईटी सर्विसेज के लिए विख्यात भारत दुनिया भर की गेमिंग कंपनियों का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है। कुछ वर्ष पहले तक भारत में कार्टून फिल्में विदेशों से बनकर आती थीं, लेकिन देश में मगर देश में ट्रेंड लोगों की बढती संख्या के कारण अब देश में ही इनका निर्माण बहुत तेजी से हो रहा है। इस तरह की फिल्मों में 2डी और 3डी एनिमेशन तथा साउंड इफेक्ट्स का इस्तेमाल किया जाता है। यदि आप में क्रिएटिविटी है, तो इस फील्ड में आगे बढने की अनंत संभावनाएं हैं। इसके अलावा, लगातार बढते चैनलों और उनके लिए बनाए जाने वाले प्रोग्राम्स की भारीडिमांड को देखते हुए इस क्षेत्र में डिजाइनर, कैमरामैन, साउंड रिकॉर्डिस्ट, कंपोजिटर, गेम्स डिजाइन स्पेशलिस्ट, एनिमेटर आदि में खूब संभावनाएं हैं।

Career in Software Testing


कंप्यूटरने दुनिया बदल दी है, तो इसमें नए-नए सॉफ्टवेयर्स का भी बडा हाथ है। सॉफ्टवेयर के बिना आज के मॉडर्न कंप्यूटर व‌र्ल्ड की कल्पना करना बेमानी ही होगा। सॉफ्टवेयर कंसल्टिंग फर्म ओवम के मुताबिक, ग्लोबल सॉफ्टवेयर टेस्टिंग मार्केट वर्ष 2013 तक 56 अरब डॉलर का हो जाएगा। बढते मार्केट की वजह से सॉफ्टवेयर टेस्टिंग करियर के लिहाज से एक उम्दा क्षेत्र के रूप में उभर रहा है।
क्या है सॉफ्टवेयर टेस्टिंग
जब सॉफ्टवेयर तैयार होता है, तो इसकी गुणवत्ता को परखने के लिए सॉफ्टवेयर टेस्टर की जरूरत होती है। दरअसल, सॉफ्टवेयर टेस्टर, सॉफ्टवेयर इंजीनियर, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट की तरह ही एक अलग प्रोफेशन है। सॉफ्टवेयर के निर्माण और विकास से सॉफ्टवेयर टेस्टर का कुछ ज्यादा सरोकार नहीं होता है।
जब सॉफ्टवेयर इंजीनियर और डेवलपर्स किसी सॉफ्टवेयर को तैयार कर लेते हैं, इसके बाद शुरू होता है सॉफ्टवेयर टेस्टर का काम। टेस्टर सॉफ्टवेयर की गुणवत्ता, तकनीकी क्षमता और उसकी स्टैबिलिटी को परखते हैं। आमतौर पर टेस्टिंग को दो हिस्सों में बांटा जाता है- मैनुअली टेस्टिंग और ऑटोमैटेड टेस्टिंग।
मैनुअली टेस्टिंग में टेस्टर सामान्य तौर पर ही किसी सॉफ्टवेयर की जांच करते हैं, लेकिन ऑटोमैटेड टेस्टिंग में टेस्टिंग टूल का इस्तेमाल किया जाता है। इसके तहत ब्लैक बॉक्स टेस्टिंग, व्हाइट बॉक्स टेस्टिंग, ग्रे बॉक्स टेस्टिंग, फंक्शनल टेस्टिंग, स्ट्रेस टेस्टिंग, लोड टेस्टिंग, स्मोक टेस्टिंग, सिस्टम टेस्टिंग, इंटीग्रेटेड टेस्टिंग और रीग्रेशन टेस्टिंग जैसे कार्य होते हैं।
क्यों अपनाएं यह करियर
हाल के महीनों में आईटी कंपनियों की स्थिति बेहद अच्छी नहीं थी, बावजूद इसके सॉफ्टवेयर टेस्टिंग के कारोबार में अच्छी-खासी तेजी देखी गई। एक अनुमान के मुताबिक, वर्ष 2010 तक टेस्टिंग सेवाओं का अंतरराष्ट्रीय मार्केट 13 अरब डॉलर का हो जाने की उम्मीद है। इसमें से 45 से 50 प्रतिशत काम भारत से आउटसोर्स किए जाने का अनुमान है।
जानकार कहते हैं कि भारत आउटसोर्स टेस्टिंग मार्केट का 70 प्रतिशत हिस्सा हासिल करने की क्षमता रखता है। इससे जाहिर है कि सॉफ्टवेयर टेस्टिंग के फील्ड में आने वाले दिनों में गतिविधियां और तेजी से बढेगी।
कोर्स ऐंड क्वालिफिकेशन
कंप्यूटर एजुकेशन देने वाले देश में प्रमुख संस्थान सॉफ्टवेयर टेस्टिंग में डिप्लोमा और सर्टिफिकेट कोर्स मुहैया कराते हैं। इसके अलावा, इंटरनेशनल सॉफ्टवेयर टेस्टिंग क्वालिफिकेशन बोर्ड द्वारा एक अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त कोर्स उपलब्ध है, जो देश के साथ-साथ विदेश में नौकरी दिलाने में सहायक होता है।
आमतौर पर सॉफ्टवेयर टेस्टिंग कोर्स में एडमिशन के लिए कई संस्थान बीएससी, बीसीए, एमएससी, बीई, बीटेक, एमई, एमटेक जैसी डिग्री की डिमांड करती है।
पर्सनल स्किल
सॉफ्टवेयर टेस्टर को टेक्नोलॉजी के साथ-साथ बिजनेस की भी अच्छी समझ होनी चाहिए। ऐसा होने पर ही टेस्टर बेहतर और बारीकी से अपना काम कर सकेंगे। टेस्टर के लिए सभी आवश्यकताओं का ठीक तरह से आकलन अहम होता है। इसके बाद टेस्टिंग की कार्ययोजना तैयार करना, उनका क्रियान्वयन करना, दोष व खतरे को तलाशना, उनकी रिपोर्ट तैयार करना टेस्टर की ही जिम्मेवारी होती है। इतना ही नहीं, एप्लिकेशन से जुडे संभावित जोखिमों के बारे में आगाह करना भी टेस्टर का ही काम होता है।
जॉब का रोमांच
नैसकॉम के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष में सूचना-प्रौद्योगिकी क्षेत्र की कंपनियों में 30 से 40 हजार लोगों को नौकरियां मिल सकती हैं। इससे साफ है कि इस इंडस्ट्री में फिर से रौनक लौट रही है। मैकिंजे ऐंड कंपनी द्वारा वर्ष 2020 तक की संभावनाओं पर जारी एक रिपोर्ट में कहा कि मौजूदा तेजी, टैलेंट और इंफ्रास्ट्रक्चर की आपूर्ति के दम पर भारतीय आईटी इंडस्ट्री का निर्यात कारोबार 2020 तक 178 अरब डॉलर का हो जाएगा। घरेलू कारोबार की हिस्सेदारी 2020 तक 50 अरब डॉलर का हो जाएगा।
इस समय भारत की कई आईटी सॉफ्टवेयर कंपनियों ने अब नई भर्तियां करने की घोषणा की है। सॉफ्टवेयर कंपनियों की बात करें, तो इनमें टीसीएस, विप्रो, सत्यम, इन्फोसिस, कॉग्निजंट आदि प्रमुख हैं, जहां आप बेहतर करियर की उम्मीद कर सकते हैं।
इंस्टीट्यूट वॉच
अन्ना यूनिवर्सिटी, चेन्नई
http://www.annauniv.edu
एसक्यूटीएल इंटीग्रेटेड सोल्यूशंस प्रा.लि, पुणे,
admin@sqtl.com
पीक्यूआर सॉफ्टवेयर
abasu@pqrsoftware.com
त्यागराज कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, मदुरै
malini_vsaravanan@tce.edu
डाटाप्रो कंप्यूटर प्रा.लि, विशाखापत्तनम
mro@datapro.inmfvizag@rediffmail.com
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ सॉफ्टवेयर टेस्टिंग, कोयंबटूर
www.iist-global.com
क्रेसटेक
www.crestechsoftware.com
रोमांचक है टेस्टिंग का काम
सॉफ्टवेयर के बढते उपयोग और कारोबार के कारण सॉफ्टवेयर टेस्टिंग के क्षेत्र में काफी स्कोप देखा जा रहा है।
सॉफ्टवेयर टेस्टिंग के प्रति पेशेवरों का नजरिया क्या है?
नए स्नातक आजकल टेस्टिंग में करियर बनाने को काफी उत्सुक नजर आने लगे हैं। यह एक बडा परिवर्तन है। इंटरनेट की बदौलत आज सॉफ्टवेयर एप्लिकेशन कहीं ज्यादा लोगों द्वारा उपयोग में लाए जा रहे हैं। ऐसे में बिजनेस की सफलता काफी हद तक इन एप्लिकेशन की गुणवत्ता और कार्यक्षमता पर निर्भर करती है।
कितना रोमांचक है यह काम?
सॉफ्टवेयर में दोष ढूंढने का काम काफी रोमांच भरा होता है। इस क्षेत्र में कामयाब होने के लिए एक सकारात्मक रवैया, पैनी नजर और जोश जरूरी है।
क्या भारतीय सॉफ्टवेयर टेस्टर्स अंतरराष्ट्रीय दर्जे के होतेहैं?
टेस्टिंग सेवाओं की आउटसोर्सिग के क्षेत्र में भारत अग्रणी है। यहां का टेस्टिंग मार्केट आकार के लिहाज से अंतरराष्ट्रीय मार्केट की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ रहा है। जिस तरह हमारे टेस्टर्स ऊंचे से ऊंचे दर्जे के, जटिल से जटिल सिस्टम्स को सफलता से टेस्ट कर रहे हैं, उसे देखकर यह विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि भारतीय टेस्टर किसी से भी कम नहीं।
टेस्टिंग एक कला है या विज्ञान?
सॉफ्टवेयर टेस्टिंग आज एक स्वतंत्र विधा बन चुकी है। यह टेक्नोलॉजी और बिजनेस ज्ञान के मिश्रण से बनी विधा है। उस लिहाज से देखें, तो इसमें कला भी है, विज्ञान और इंजीनियरी भी। आज करियर के लिहाज से इस क्षेत्र में काफी अच्छी संभावनाएं हैं।

Thursday, September 24, 2009

swine flu

Like people, pigs can get influenza (flu), but swine flu viruses aren't the same as human flu viruses. Swine flu doesn't often infect people, and the rare human cases that have occurred in the past have mainly affected people who had direct contact with pigs. But the current "swine flu" outbreak is different. It's caused by a new swine flu virus that has changed in ways that allow it to spread from person to person -- and it's happening among people who haven't had any contact with pigs.
That makes it a human flu virus. To distinguish it both from flu viruses that infect mainly pigs and from the seasonal influenza A H1N1 viruses that have been in circulation for many years, the CDC calls the virus "novel influenza A (H1N1) virus" and the World Health Organization calls it "pandemic (H1N1) 2009." The CDC calls swine flu illness "H1N1 flu" and the World Health Organization calls it "pandemic influenza A (H1N1)."
What are swine flu symptoms?
Symptoms of swine flu are like regular flu symptoms and include fever, cough, sore throat, runny nose, body aches, headache, chills, and fatigue. Many people with swine flu have had diarrhea and vomiting. Nearly everyone with flu has at least two of these symptoms. But these symptoms can also be caused by many other conditions. That means that you and your doctor can't know, just based on your symptoms, if you've got swine flu. Health care professionals may offer a rapid flu test, although a negative result doesn't necessarily mean you don't have the flu.
Like seasonal flu, pandemic swine flu can cause neurologic symptoms in children. These events are rare, but, as cases associated with seasonal flu have shown, they can be very severe and often fatal. Symptoms include seizures or changes in mental status (confusion or sudden cognitive or behavioral changes). It's not clear why these symptoms occur, although they may be caused by Reye's syndrome. Reye's syndrome usually occurs in children with a viral illness who have taken aspirin -- something that should always be avoided.
Only lab tests can definitively show whether you've got swine flu. State health departments can do these tests. But given the large volume of samples coming in to state labs, these tests are being reserved for patients with severe flu symptoms. Currently, doctors are reserving antiviral drugs for people with or at risk of severe influenza

Thursday, September 10, 2009