Thursday, April 14, 2011

What is lazy fetching in Hibernate? With Example .

Lazy fetching decides whether to load child objects while loading the Parent Object.
You need to do this setting respective hibernate mapping file of the parent class.
Lazy = true (means not to load child)
By default the lazy loading of the child objects is true.
This make sure that the child objects are not loaded unless they are explicitly invoked in the application by calling getChild() method on parent.In this case hibernate issues a fresh database call to load the child when getChild() is actully called on the Parent object
.But in some cases you do need to load the child objects when parent is loaded.
Just make the lazy=false and hibernate will load the child when parent is loaded from the database.
Example :
If you have a TABLE ? EMPLOYEE mapped to Employee object and contains set of Address objects.
Parent Class : Employee class
Child class : Address Class
public class Employee {
private Set address = new HashSet(); // contains set of child Address objects
public Set getAddress () {
return address;
}
public void setAddresss(Set address) {
this. address = address;
}
}
In the Employee.hbm.xml file




In the above configuration.
If lazy="false" : - when you load the Employee object that time child object Adress is also loaded and set to setAddresss() method.
If you call employee.getAdress() then loaded data returns.No fresh database call.

If lazy="true" :- This the default configuration. If you don?t mention then hibernate consider lazy=true.
when you load the Employee object that time child object Adress is not loaded. You need extra call to data base to get address objects.
If you call employee.getAdress() then that time database query fires and return results. Fresh database call.

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Saturday, April 9, 2011

FIR दर्ज न हो तो

क्या है एफआईआर

किसी अपराध की सूचना जब किसी पुलिस ऑफिसर को दी जाती है तो उसे एफआईआर कहते हैं। यह सूचना लिखित में होनी चाहिए या फिर इसे लिखित में परिवतिर्त किया गया हो। एफआईआर भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता 1973 के अनुरूप चलती है। एफआईआर संज्ञेय अपराधों में होती है। अपराध संज्ञेय नहीं है तो एफआईआर नहीं लिखी जाती।

आपके अधिकार

- अगर संज्ञेय अपराध है तो थानाध्यक्ष को तुरंत प्रथम सूचना रिपोर्ट ( एफआईआर ) दर्ज करनी चाहिए। एफआईआर की एक कॉपी लेना शिकायत करने वाले का अधिकार है।

- एफआईआर दर्ज करते वक्त पुलिस अधिकारी अपनी तरफ से कोई टिप्पणी नहीं लिख सकता , ही किसी भाग को हाईलाइट कर सकता है।

- संज्ञेय अपराध की स्थिति में सूचना दर्ज करने के बाद पुलिस अधिकारी को चाहिए कि वह संबंधित व्यक्ति को उस सूचना को पढ़कर सुनाए और लिखित सूचना पर उसके साइन कराए।

- एफआईआर की कॉपी पर पुलिस स्टेशन की मोहर पुलिस अधिकारी के साइन होने चाहिए। साथ ही पुलिस अधिकारी अपने रजिस्टर में यह भी दर्ज करेगा कि सूचना की कॉपी आपको दे दी गई है।

- अगर आपने संज्ञेय अपराध की सूचना पुलिस को लिखित रूप से दी है , तो पुलिस को एफआईआर के साथ आपकी शिकायत की कॉपी लगाना जरूरी है।

- एफआईआर दर्ज कराने के लिए यह जरूरी नहीं है कि शिकायत करने वाले को अपराध की व्यक्तिगत जानकारी हो या उसने अपराध होते हुए देखा हो।

- अगर किसी वजह से आप घटना की तुरंत सूचना पुलिस को नहीं दे पाएं , तो घबराएं नहीं। ऐसी स्थिति में आपको सिर्फ देरी की वजह बतानी होगी।

- कई बार पुलिस एफआईआर दर्ज करने से पहले ही मामले की जांच - पड़ताल शुरू कर देती है , जबकि होना यह चाहिए कि पहले एफआईआर दर्ज हो और फिर जांच - पड़ताल।

- घटना स्थल पर एफआईआर दर्ज कराने की स्थिति में अगर आप एफआईआर की कॉपी नहीं ले पाते हैं , तो पुलिस आपको एफआईआर की कॉपी डाक से भेजेगी।

- आपकी एफआईआर पर क्या कार्रवाई हुई , इस बारे में संबंधित पुलिस आपको डाक से सूचित करेगी।

- अगर थानाध्यक्ष सूचना दर्ज करने से मना करता है , तो सूचना देने वाला व्यक्ति उस सूचना को रजिस्टर्ड डाक द्वारा या मिलकर क्षेत्रीय पुलिस उपायुक्त को दे सकता है , जिस पर उपायुक्त उचित कार्रवाई कर सकता है।

- एएफआईआर लिखे जाने की हालत में आप अपने एरिया मैजिस्ट्रेट के पास पुलिस को दिशा - निर्देश देने के लिए कंप्लेंट पिटिशन दायर कर सकते हैं कि 24 घंटे के अंदर केस दर्ज कर एफआईआर की कॉपी उपलब्ध कराई जाए।

- अगर अदालत द्वारा दिए गए समय में पुलिस अधिकारी शिकायत दर्ज नहीं करता या इसकी प्रति आपको उपलब्ध नहीं कराता या अदालत के दूसरे आदेशों का पालन नहीं करता , तो उस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई के साथ उसे जेल भी हो सकती है।

- अगर सूचना देने वाला व्यक्ति पक्के तौर पर यह नहीं बता सकता कि अपराध किस जगह हुआ तो पुलिस अधिकारी इस जानकारी के लिए प्रश्न पूछ सकता है और फिर निर्णय पर पहुंच सकता है। इसके बाद तुरंत एफआईआर दर्ज कर वह उसे संबंधित थाने को भेज देगा। इसकी सूचना उस व्यक्ति को देने के साथ - साथ रोजनामचे में भी दर्ज की जाएगी।

- अगर शिकायत करने वाले को घटना की जगह नहीं पता है और पूछताछ के बावजूद भी पुलिस उस जगह को तय नहीं कर पाती है तो भी वह तुरंत एफआईआर दर्ज कर जांच - पड़ताल शुरू कर देगा। अगर जांच के दौरान यह तय हो जाता है कि घटना किस थाना क्षेत्र में घटी , तो केस उस थाने को ट्रांसफर हो जाएगा।

- अगर एफआईआर कराने वाले व्यक्ति की केस की जांच - पड़ताल के दौरान मौत हो जाती है , तो इस एफआईआर को Dying Declaration की तरह अदालत में पेश किया जा सकता है।

- अगर शिकायत में किसी असंज्ञेय अपराध का पता चलता है तो उसे रोजनामचे में दर्ज करना जरूरी है। इसकी भी कॉपी शिकायतकर्ता को जरूर लेनी चाहिए। इसके बाद मैजिस्ट्रेट से सीआरपीसी की धारा 155 के तहत उचित आदेश के लिए संपर्क किया जा सकता है।

जब ATM में फंस जाए पैसा

बैंक में शिकायत

- सबसे पहले आपको उस ब्रांच में शिकायत दर्ज करानी चाहिए, जिसमें आपका खाता है। जिस एटीएम से आप पैसा निकाल रहे हैं, उसकी नजदीकी ब्रांच में भी इस बाबत शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। शिकायत दर्ज कराने के बाद उसकी एक कॉपी अपने पास जरूर रखें।

- कई बैंकों के एटीएम में टेलिफोन भी होते हैं, जिनसे कॉल करके आप सीधे बैंक के कॉल सेंटर से जुड़कर पैसा न निकलने की सूचना दे सकते हैं।

- अगर बैंक को सूचना देने के 30 दिनों के अंदर आपकी शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं होती है और आपकी रकम वापस नहीं मिलती है तो आप आरबीआई या बैंकिंग ओम्बड्समैन में इसकी शिकायत दर्ज करा सकते हैं। इसके लिए इस लिंक को फॉलो करें http://secweb.rbi.org.in/bo/compltindex.htm

क्या है नियम

इन शिकायतों को देखते हुए केंद्रीय बैंक आरबीआई ने पिछले दिनों बैंकों को निदेर्श दिया कि एटीएम में फंसे हुए पैसे ग्राहक द्वारा शिकायत दर्ज कराने के 12 दिनों के भीतर मिल जाने चाहिए। अगर कोई बैंक 12 दिनों के अंदर इस तरह एटीएम में फंसा हुआ पैसा कस्टमर को नहीं देता है तो उसके बाद उसे 100 रुपये रोज के हिसाब से जुर्माना भी देना होगा।

रकम न निकलने का सुबूत

हर दिन की समाप्ति पर बैंक इस बात का हिसाब-किताब करते हैं कि एटीएम में सुबह कितने नोट और रकम रखी गई थी, उस दिन कितनी रकम निकाली गई और कितने की रसीदें जारी की गईं। बैंकों को इस हिसाब-किताब के दौरान यह पता चल जाता है कि वाकई किसी कस्टमर को रकम नहीं मिली है। इसके अलावा हर बैंक के एटीएम में कैमरे भी लगे होते हैं। अगर किसी को ट्रांजैक्शन करने के बाद कैश नहीं मिल पाया है तो यह चीज कैमरे में रेकॉर्ड हो जाएगी और बैंक कर्मचारियों को इसकी सही जानकारी हासिल हो जाएगी।